हरिद्वार, जिसे भारत की सबसे पवित्र धार्मिक नगरीयों में गिना जाता है, इन दिनों धार्मिक स्थलों पर पूजा-पाठ और अन्य सेवाओं के नाम पर की जा रही कथित मनमानी वसूली को लेकर विवादों में घिरता नजर आ रहा है। आस्था और विश्वास का यह केंद्र अब बढ़ते असंतोष और नाराज़गी की वजह बनता जा रहा है, जिससे श्रद्धालुओं के साथ-साथ स्थानीय नागरिकों में भी चिंता बढ़ गई है।
देश के कोने-कोने से हरिद्वार पहुंचने वाले श्रद्धालु गंगा स्नान, मंदिर दर्शन, आरती, अभिषेक और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए यहां आते हैं। लेकिन हाल के दिनों में श्रद्धालुओं का आरोप है कि कई धार्मिक स्थलों पर पूजा-सेवा को लेकर तय सीमा से अधिक शुल्क वसूला जा रहा है। विशेष पूजा, शीघ्र दर्शन और अन्य धार्मिक कार्यों के लिए अलग-अलग दरें तय कर दी गई हैं, जिनकी न तो पहले से जानकारी दी जाती है और न ही कोई स्पष्ट सूची सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की गई है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि जब वे मंदिर परिसर में प्रवेश करते हैं तो उनसे विभिन्न सेवाओं के नाम पर अतिरिक्त धनराशि मांगी जाती है। कई बार भक्तों को यह भी बताया जाता है कि बिना शुल्क दिए पूजा या विशेष दर्शन संभव नहीं है। इससे आम श्रद्धालु खुद को असहाय महसूस करता है और आस्था से जुड़े स्थानों पर ठगा हुआ सा महसूस करता है।
स्थानीय निवासियों और धार्मिक संगठनों ने भी इस स्थिति पर नाराज़गी जताई है। उनका कहना है कि हरिद्वार की पहचान केवल एक धार्मिक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक नगरी के रूप में है, जहां सेवा और श्रद्धा को सर्वोपरि माना जाता है। पूजा-पाठ को व्यापार का रूप देना इस परंपरा के खिलाफ है और इससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचती है।
कुछ सामाजिक संगठनों का आरोप है कि धार्मिक स्थलों के आसपास सक्रिय कुछ लोग श्रद्धालुओं की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं। विशेष अवसरों, पर्वों और भीड़ के समय वसूली और भी बढ़ जाती है। इससे न केवल श्रद्धालुओं की आस्था प्रभावित हो रही है, बल्कि हरिद्वार की छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है।
इस मुद्दे को लेकर कई श्रद्धालुओं ने जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों के समक्ष अपनी शिकायतें दर्ज कराई हैं। लोगों की मांग है कि पूजा-सेवा के नाम पर वसूली के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं और सभी दरें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाएं। साथ ही यह भी मांग की जा रही है कि श्रद्धालुओं के साथ किसी भी प्रकार का दबाव या जबरदस्ती न की जाए।
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि उन्हें इस संबंध में शिकायतें प्राप्त हुई हैं और मामले की जांच की जा रही है। यदि किसी धार्मिक स्थल या उससे जुड़े लोगों द्वारा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन का यह भी कहना है कि धार्मिक स्थलों की गरिमा बनाए रखना उनकी प्राथमिकता है।
धार्मिक विशेषज्ञों और संत समाज का भी मानना है कि पूजा-पाठ का उद्देश्य श्रद्धा और आत्मिक शांति है, न कि आर्थिक लाभ। यदि इस तरह की गतिविधियों पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया, तो इससे आने वाले समय में धार्मिक स्थलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, हरिद्वार जैसे पवित्र तीर्थ स्थल पर बढ़ती मनमानी वसूली ने एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। अब देखना होगा कि प्रशासन और संबंधित संस्थाएं इस दिशा में क्या कदम उठाती हैं, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था सुरक्षित रहे और धार्मिक मर्यादा कायम रखी जा सके।













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