राजस्थान–हरियाणा–दिल्ली एनसीआर:
देश की सबसे प्राचीन और पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई, जिसमें देशभर से आए पर्यावरण विशेषज्ञों, वन विभाग के अधिकारियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक का मुख्य उद्देश्य अरावली क्षेत्र में तेजी से हो रहे पर्यावरणीय क्षरण को रोकने के लिए एक ठोस और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना रहा।
बैठक में विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि अरावली पर्वतमाला लगातार अवैध खनन, अनियंत्रित शहरीकरण और वनों की कटाई का शिकार हो रही है। इससे न केवल जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि भूजल स्तर में गिरावट और तापमान में वृद्धि जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आ रही हैं। अरावली को उत्तर भारत के लिए प्राकृतिक “ग्रीन बैरियर” बताते हुए वक्ताओं ने कहा कि इसके कमजोर होने से दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण और गर्मी का प्रकोप और बढ़ सकता है।
बैठक के दौरान कई अहम सुझाव सामने आए। इनमें अरावली क्षेत्र में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाने, पारंपरिक जलस्रोतों के पुनर्जीवन, खनन गतिविधियों पर सख्त निगरानी और आधुनिक तकनीक के माध्यम से नियमित पर्यावरणीय सर्वे शामिल हैं। विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि स्थानीय समुदायों को अरावली संरक्षण से जोड़ा जाए ताकि वे स्वयं इसके रक्षक बन सकें।
पर्यावरणविदों ने यह भी कहा कि केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके सख्त और पारदर्शी क्रियान्वयन की जरूरत है। बैठक के अंत में केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की गई कि अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता घोषित किया जाए और इसके लिए विशेष बजट व निगरानी तंत्र विकसित किया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो अरावली का अस्तित्व गंभीर संकट में पड़ सकता है, जिसका असर आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा।













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