मध्य पूर्व के कई देशों ने बढ़ते जल संकट और जल संसाधनों की कमी को देखते हुए एक संयुक्तीय जल प्रबंधन समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसे क्षेत्रीय सहयोग की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम माना जा रहा है। इस समझौते का उद्देश्य सीमित जल संसाधनों का संतुलित, वैज्ञानिक और टिकाऊ उपयोग सुनिश्चित करना है।
समझौते के तहत भागीदार देश जल संरक्षण तकनीक, डिसेलिनेशन (समुद्री जल को पीने योग्य बनाने), वर्षा जल संचयन और आधुनिक सिंचाई प्रणालियों पर मिलकर काम करेंगे। साथ ही, जल बंटवारे को लेकर पारदर्शिता और आपसी समन्वय बढ़ाने पर भी सहमति बनी है, जिससे भविष्य में किसी भी प्रकार के विवाद से बचा जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन, लगातार सूखा और बढ़ती आबादी के कारण मध्य पूर्व में जल संकट गंभीर रूप ले चुका है। ऐसे में यह समझौता न केवल पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद करेगा, बल्कि कृषि, ऊर्जा और मानव जीवन की सुरक्षा के लिए भी बेहद अहम साबित होगा।
इस पहल के तहत एक संयुक्त जल निगरानी तंत्र भी विकसित किया जाएगा, जिससे जल स्तर, उपयोग और संरक्षण पर लगातार नज़र रखी जा सकेगी। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठनों ने इस समझौते का स्वागत करते हुए इसे अन्य जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए एक आदर्श मॉडल बताया है।













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