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तुलसी पूजन दिवस: सनातन धर्म, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम

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सनातन धर्म में तुलसी पूजन दिवस का विशेष स्थान है। यह दिन केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, प्रकृति प्रेम और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक भी माना जाता है। हर वर्ष दिसंबर माह में मनाया जाने वाला तुलसी पूजन दिवस लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव जागृत करने का अवसर प्रदान करता है।

हिंदू शास्त्रों के अनुसार तुलसी को देवी वृंदा का रूप माना गया है और उनका विवाह भगवान विष्णु से हुआ था। इसी कारण से तुलसी दल का उपयोग भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और शालिग्राम की पूजा में अनिवार्य माना जाता है। मान्यता है कि बिना तुलसी के भगवान विष्णु की पूजा अधूरी रहती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी पूजन करने से घर में नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। सुबह और शाम तुलसी के सामने दीपक जलाने से मानसिक शांति मिलती है और परिवार में आपसी प्रेम बना रहता है। कई घरों में तुलसी पूजन के साथ मंत्र जाप और आरती भी की जाती है।

आयुर्वेद के अनुसार तुलसी को औषधीय गुणों का भंडार माना गया है। तुलसी का सेवन शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और बदलते मौसम में होने वाली बीमारियों से बचाव करता है। यही कारण है कि प्राचीन काल से भारतीय घरों में तुलसी का पौधा अनिवार्य रूप से लगाया जाता रहा है।

तुलसी पूजन दिवस का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण भी है। इस अवसर पर कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों द्वारा तुलसी के पौधे वितरित किए जाते हैं और लोगों को अधिक से अधिक पौधारोपण के लिए प्रेरित किया जाता है। यह दिन संदेश देता है कि सनातन संस्कृति में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि देवी के रूप में पूजा गया है।

धार्मिक विद्वानों का मानना है कि तुलसी पूजन से व्यक्ति के जीवन में सात्विकता, संयम और सकारात्मक सोच का विकास होता है। आज के आधुनिक और तनावपूर्ण जीवन में तुलसी पूजन दिवस लोगों को शांति, धैर्य और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

कुल मिलाकर, तुलसी पूजन दिवस केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि यह सनातन धर्म की गहराई, वैज्ञानिक सोच और प्रकृति के साथ सामंजस्य को दर्शाने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसे आने वाली पीढ़ियों तक सहेज कर रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

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