भारतीय संस्कृति में नववर्ष को केवल कैलेंडर बदलने का दिन नहीं माना जाता, बल्कि यह आत्मचिंतन, आध्यात्मिक शुद्धि और जीवन में सकारात्मक बदलाव का प्रतीक होता है। देशभर में लोग नववर्ष का स्वागत पूजा-पाठ, हवन, ध्यान और सेवा कार्यों के माध्यम से करते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा मिलता है।
नववर्ष के अवसर पर मंदिरों, आश्रमों और तीर्थ स्थलों में विशेष पूजा-अर्चना, गंगा आरती, यज्ञ और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु ईश्वर से स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि की कामना करते हुए नए वर्ष की शुरुआत करते हैं। संत समाज का मानना है कि नववर्ष का सही अर्थ बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धता और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लेना है।
भारतीय परंपरा में सेवा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। इसी भावना के साथ नववर्ष पर कई सामाजिक और धार्मिक संस्थाएं गरीबों को भोजन वितरण, वस्त्र दान, चिकित्सा शिविर और स्वच्छता अभियान जैसे सेवा कार्यों का आयोजन करती हैं। इससे समाज के कमजोर वर्गों को सहयोग मिलता है और मानवता का संदेश सुदृढ़ होता है।
साथ ही, नववर्ष को आत्मसंयम और आत्मविकास से जोड़ते हुए लोग बुरी आदतों को छोड़ने, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलने तथा प्रकृति और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को निभाने का संकल्प लेते हैं। विद्वानों और धर्माचार्यों का कहना है कि भारतीय संस्कृति का मूल उद्देश्य व्यक्ति के भीतर नैतिकता, करुणा और सहिष्णुता का विकास करना है।
इस प्रकार, भारतीय संस्कृति में नववर्ष पूजा, सेवा और संकल्प के माध्यम से न केवल व्यक्तिगत जीवन को दिशा देता है, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता को भी मजबूत करता है।













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